Thursday, 2 January 2020

रूहानी मार्ग की बातें - परमात्मा की नाराज़गी की सबसे बड़ी निशानी


1. परमात्मा जब किसी से नाराज़ होता है तो वह उसका रिज्क नहीं बन्द करता और न ही जीव को कोई दुख देता है और न ही सूर्य को आज्ञा देता है कि इसके आंगन को रोशनी नहीं देना बल्कि परमात्मा जब किसी से नाराज़
होता है तो वह उसका वो वक्त छीन लेता है जिस वक्त वह बन्दगी कर सके।
परमात्मा की बन्दगी न कर सकना उस परमात्मा की नाराज़गी की सबसे बड़ी निशानी है और जो जीव हर रोज भजन बन्दगी करते हैं तो वह खुशनसीब हैं कि परमात्मा उस जीव से बहुत खुश हैं और जीव को पल पल परमात्मा का शुक्रिया अदा करना चाहिए।

2. सतगुरु तो सच्चे दिल से हमें अपनाते हैं हमें नामदान की बख्शिश भी करते हैं। लेकिन हम ऐसे निक्कमे और आलसी हैं कि गुरु के प्रेम का महत्त्व ही नहीं समझते। हमारे पास सिमरन और भजन का समय ही नहीं होता। हर समय दुनियादारी में खोये रहते हैं और झूठे रिश्तों को निभाने में ही अपना पूरा जीवन व्यर्थ कर देते हैं।

3. दया मेहर करना - 
 बाबा सावन सिंह महाराज जी के अनमोल वचन महाराज जी बाहर से आई हुई संगत को विदा कर रहे थे तो उनमे से एक ने कहा की महाराज जी दया मेहर करना. तो इस पर महाराज जी हंसकर ऊपर अपने कमरे में चले गये. बीबी लाजो सब देख रही थी उससे रहा नही गया और वो भी महाराज जी के पीछे कमरे में चली गई और महाराज जी से सवाल किया की दया मेहर की बात पर वो हसंकर ऊपर क्यूँ आ गये. बडे महाराज साहिब ने बहुत प्यारा जवाब दिया बीबी हम रात रोज़ सुबह 2 बजे दया मेहर की टोकरी लेके निकलते हैं. कोई सो रहा होता है, कोई काम में लीन होता है, कोई दुनिया के काम कर रहा होता है. जो जो भजन मे सुबह बैठे होते है उस टोकरी मे से दया के फूल बरसाते है ।
 फिर बड़े महाराज साहिब ने बीबी लाजो से कहा हमे बहुत अफसोस होता हे कि कुछ भागयशली जीव जो जागते है वही फायदा उठा पाते है और बाकी सारी की सारी दया की टोकरी हमे वापिस लानी पड़ती है हमे बहुत दुख होता है संत कहनदे यह करनी का मार्ग है गला बाता द मार्ग नहीं है कोई वहाना नहीं चलना भजन सीमरन विच जी उस ने उस नू तार दिया ऐसे सब मन दे पुलेखे विच फिर रहे हैं जिने मर्जी मेसेज करदे रहीये जिने मर्जी लफजा द इस्तेमाल करदे रहीये कुछ नहीं होना जद तक अन्दर शब्द धुन नू नहीं पकडदे जद हुक्म ही मालिक द इको है अन्दर नू ध्यान लगाना  भजन-सिमरन सतगुरु का ही असली हुक्म है मन तू जोत स्वरुप है अपना मूल पहचान .

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