Monday, 4 March 2019

हमारे वर्तमान जीवन के अस्तित्व का आधार क्या है ?


 हमारे जीवन का आधार हमारी मन ,इंद्रियां या शरीर नही बल्कि आत्मा है । जो कि अमर अविनाशी अजन्मा है । हमारी आत्मा बिल्कुल परमात्मा की तरह ही ज्ञान ,शक्ति एवम आनंद रूप मानी जाती है । जिसे न आग जला सकती है, न पानी या अन्य चीजों से नष्ट हो सकती है । यह तो हुआ आत्मा का संक्षिप्त परिचय
लेकिन अब यह सवाल उठता है कि आत्मा का असली निवास कहां है ?
वास्तव में आत्मा इस नश्वर संसार की रहने वाली नही है । असल मे यह सहज आनंद और ज्ञान से पूर्ण अजर अमर धाम सतलोक की रहने वाली है । और किसी भी भेद भाव से ग्रसित नही है । इस लोक में आने के बाद आत्मा को काल माया के इस संसार मे रहने के लिए अपने ऊपर मायावी पर्दे डालने ही पड़ते है । क्योंकि इस मायावी जगत में। आत्मा अपने विशुद्ध रूप में नही रह सकती है और न ही सांसारिक लोग आत्मा का असली तेज व प्रकाश सहन कर सकते है ।


अब बात आत्मा एवम जीव के साथ की । जब तक आत्मा मन एवम इन्द्रियों का साथ नही लेती , तब तक वह पूर्ण रूप से अपने शुद्ध स्वरूप में होती है । लेकिन जैसे ही वह मन एवम इन्द्रियों का साथ लेती है तब वह जीवात्मा कहलाती है । और हमारे वर्तमान। जीवन में जीव एवम आत्मा का मेल है । शरीर रथ के समान है , मन घोड़ों की तरह ,और आत्मा रथवान है । आत्मा को सिर्फ मायावी संसार मे रहने के लिए मन इन्द्रियों या शरीर की जरूरत पड़ती है । पवित्र रूहानी जगत सतलोक में इसे किसी पर निर्भर नही रहना पड़ता है । क्यों कि मन ,इन्द्रियाँ जड़ है । ये सब आत्मा से प्रकाशित हो कर या शक्ति लेकर काम करते है । धीरे धीरे ये आत्मा पर हावी हो जाते है और आत्मा के हुक्म में चलने की बजाय आत्मा को ही अपने वश में कर लेते है । इसका नतीजा यह होता है कि हमारी आत्मा नाशवान संसार के भोगों की तरफ खींची चली जाती है व उनके अनुसार ही बंधन के कर्म करतीं है ।
अब बात आती है आत्मा की मुक्ति की । संत महात्मा समझाते है कि अज्ञानता की नींद से जागो । यह तेरा देश नही ।तेरा असल देश तो सचखंड है । तेरा असल धर्म परमात्मा का प्रेम है । तेरा निज स्वरूप मन व इन्द्रियाँ नहीं ,तू तो चेतन है । हमे हमारे असली स्वरूप का संदेश एवम पहचान देते है । असली स्वरूप की पहचान का अर्थ होता है आत्मा को मन इन्द्रियों यानी शरीर के संबंध व बंधन से अलग करते हुए उसे परमात्मा में लीन करना ।

प्यारे सतगुरु हमारे असली स्वरूप की पहचान अपनी बताई गई युक्ति के अनुसार नाम या शब्द के अभ्यास व भजन सुमिरन द्वारा करवाते है । लेकिन इस अभ्यास के तीन अंग है -- सिमरन ,ध्यान ,और शब्द धुन ।

सिमरन द्वारा आत्मा ,मन आंखों के पीछे एकाग्र हो जाती हैं । सतगुरु के स्वरूप के ध्यान द्वारा आंखों के पीछे एकाग्र हुई आत्मा को अनहद शब्द की धुन सुनाई पड़ती है व शब्द का दिव्य  प्रकाश दिखाई देना शुरू हो जाता है । इस ध्वनि व प्रकाश के सहारे आत्मा का रूहानी सफर शुरू हो जाता है व शब्द के सहारे आत्मा अपने रूहानी मण्डल , त्रिकुटी में पहुंच कर उसमें लीन हो जाती है । आत्मा की इस अवस्था को ही मुक्ति ,जड़ व चेतन की गांठ खुलना ,अपने निजी स्वरूप की पहचान करना कहते है । यह सब सच्चे सतगुरु द्वारा ही सम्भव हो पाता है । इसलिए हमें अपने सतगुरु की बताई गई युक्ति द्वारा ही आत्मा की मुक्ति मिलती है ।

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