Thursday, 4 February 2021

129 - भजन सिमरन के बिना मुक्ति क्यों नहीं होती ?

एक बार 'नाम' का बीज सत्संगी को मिल जाता है, तो वह अवश्य अंकुरित होगा. अगर सत्संगी को नाम मिला हुआ हो, और भजन सुमिरन नहीं करता है, तो मालिक उसे दूसरा जन्म देंगे, और अगले

जन्म में उसे वक्त के गुरु से नाम मिलगा, फिर उसे 'भजन-सुमिरन' करना होगा.

सत्संगी यह बात अच्छी तरह से समझ ले, कि उसे भजन सुमिरन तो करना ही है. चाहे इस जन्म में या अगले जन्म में. अगर किसी सत्संगी का भले ही भजन सुमिरन कम है, परंतु उसकी सांसरिक इच्छा नहीं है, तो सतगुरु उसे सहस्त्र दल कवल में रखकर, बाकी का भजन सुमिरन करवाकर, ऊपर के मंडलों में ले जाऐंगे. लेकिन भजन सुमिरन तो करना ही होगा जी.

जिसने सुमिरन नही किया उसने कुछ भी नही किया ! चाहे उसने लाखो दान पुण्य किये हो ग्रंथ पढे हो चाहे रोज सत्संग सुनता हो पर सुमिरन के बिना व्यर्थ है . सुमिरन के बिना सतगुरु के रूहानी दर्शन कभी नहीँ हो सकते. सच्ची तडप से 15 मिनट भी की गयी भक्ति कुछ दिनो तक की जाने वाली भक्ति से भी ज्यादा बेहतर है.

रब  रब करदे  उमर  बीत  गई ,
रब  की  है , कदे  सोच्या  ही  नहीं ,
बहुत  कुछ  मंग  लया  ते  बहु  कुछ  पा  लया ,
रब  नूं  ही  पाणा  है , कदी  सोचया  ही  नहीं ।

'सच्चा-नाम' रचना से पहले का है यह कृत्रिम नहीं कुदरती है। सृष्टि की रचना और उसका संहार भी 'नाम' के द्वारा होता है, सृष्टि 'नाम' के सहारे ही खड़ी है। 'सच्चा-नाम' आत्मा और परमात्मा के बीच एक पुल का काम करता है। यह सतलोक से आ रही 'परम-चेतन-शक्ति' की वह धारा है जो जीव को अपने साथ वापस 'सचखंड' ले जाती है।

स्पष्ट है कि जिस 'नाम' को संतों ने 'मुक्ति-दाता' माना है वह परमात्मा की परमात्मा से अभेद कोई 'अद्भुत-शक्ति' है। 

अमृत-वेले का समय ही मालिक की भक्त्ति के लिए अति गुणकारी होता है क्यों की उस समय मालिक की ओर से विशेष कृपा की धाराएँ उतरती है इस अमृत-वेले में ही प्रभु-परमात्मा का नाम जपना चाहिए क्यों की नाम का जाप करना ही सच्ची गुरु-भक्त्ति है और यही सच्ची प्रभु-भक्त्ति भी है. इस भक्त्ति द्वारा ही जीव जन्म-मरण के बन्धन तोड़कर अपने निज-घर वापस पहुँच सकता है इस अमृत-वेले में किया गया नाम का सिमरन जल्दी फलीभूत होता है इस समय नाम का सिमरन करने से प्रभु की भक्त्ति का ऐसा खज़ाना जमा हो जाता है जिसमें कभी कमी नही आती.

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