Saturday, 22 September 2018

हमारा ध्यान सिमरन में क्यों नहीं लगता ?



हम सत्संगों में और संत महात्माओं के मुखाग्र से सुनते आते हैं, कि चलते-फिरते उठते-बैठते अपनी लिव नाम के सिमरन के साथ जोड़ के रखो


बहन या माँ किचन में हो या घर का काम काज करते हुए सिमरन करे। भाई दुकान या ऑफिस में भी अपने ख्याल को सिमरन के साथ जोड़ के रखें। लेकिन संत महात्मा ये भी कहते हैं कि ऐसे नाम का सिमरन
करने वाला मालिक का प्यारा कोई विरला ही होता है । तो विचार करें क्या हम भी उन विरला मालिक के प्यारों में आते ?

आखिर हम भी तो चाहते हैं कि दिनभर के काम काज करते हुए हम भी उस सिमरन से जुड़े रहें, और हर वक़्त हमारा ख़याल सिमरन मे लगा रहे।

लेकिन आखिर हमसे ये क्यों नही हो पाता, आखिर कमी कहाँ है ?

देखिये अगर हमे किसी अपने घनिष्ट की शादी में जाना हो, तो भले ही उस शादी में अभी 1 महीने का समय बचा हो, लेकिन हम उसकी तैयारी अभी से ही शुरू करते रहते हैं , हमारा सारा ख्याल इस शादी और शादी के माहौल में घुसा रहता है । यहाँ तक कि रात को सपने में भी वहीँ के ख्याल और वहीँ के लोग नज़र आने लगते हैं ।

कहने का भाव है कि सारा ध्यान उस शादी के माहौल में रहता है ।क्योकि इन ख्यालों को मन में बार बार लाने से मन में ख़ुशी होती है , क्योकि हम शादियों के माहौल को जानते हैं, क्योकि हम जानते हैं कि शादियों में होने वाली मौज मस्ती मन को बड़ी प्यारी लगती है। मतलब हम मन की ख़ुशी और मन को भाने वाले माहौल में रहना पसन्द करते हैं , और मन का माहौल तो हम जानते ही हैं कि सिर्फ और सिर्फ बाहर ही बहार के मज़े में मस्त रहना ।

बस यही फर्क है कि हम सिमरन की ताकत और सिमरन की मौज से वंचित रहते है। क्योंकि हमने सिमरन के माहौल में कभी पूरी तरह जा कर देखा ही नही। हम तो बस सिमरन को एक मजबूरी और एक फॉर्मेल्टी के तौर पर इसे अपनी मर्जी से कभी कभी भी और कहीं भी अपने हिसाब से करते हैं । और आत्मा की ख़ुशी को अनदेखा कर मन के माहौल घूमते रहते हैं ।*

लेकिन एक बार उस सिमरन की शक्ति, सिमरन के पावर सिमरन की मौज, और सिमरन के नशे जो चख कर देख लें फिर 24 घण्टे वो सिमरन आपके अंदर चलता रहेगा।

सो अगर हम हर घड़ी अपने दुनियावी क्रियाकलाप करते हुए अपने अंदर सिमरन से लिव जोड़ना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले ये पक्का करना होगा कि संसार का सबसे बड़ा सुख सिर्फ उस नाम के सिमरन में है। सिमरन से मिलने वाले आनन्द का ख्याल रख कर अपनी लिव सिमरन के साथ जोड़नी होगी ।

जैसे एक डॉक्टर की तैयारी करने वाले स्टूडेंट का ध्यान डॉक्टरी में रहता है।  वकील बनने वाले का ख्याल वकालत में रहता है और  इंजीनियर बनने वाला का ख्याल अपने इंजीनियरिंग के कोर्स पर रहता हैं ।

अगर हम भी इंसानी जामे के मक़सद और परमात्मा प्राप्ति का लक्ष्य ले कर चलें तो हमारा ख्याल भी सिमरन में टिका रहेगा। अगर हम अपनी लिव हर वक़्त दुनियावी काम काज करते हुए सिमरन से जोड़ें रखने की कोशिश करेंगे, तो फिर ऐसी अवस्था आएगी कि आप सिमरन को नही सिमरन आपको खिंचेगा । मतलब सिमरन अपने आप चलता रहेगा।

जैसे पतंग को उड़ाने के लिये शुरू में थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है लेकिन जब पतंग उचाई पर पहुचता है तो अपने आप ही उड़ता है बस हमे डोर संभालनी होती है । जैसे पंखा चालू करने के लिए सिर्फ बटन ऑन करने की देरी होती है और ऑन होते ही पंखा अपने आप ही चलने लगता है ।

वैसे ही शुरुवात में थोड़ी मेहनत की जरूरत है। फिर सिमरन अपने आप चलता रहता है । वैसे ही सिमरन की चाह का बटन ऑन करने की देरी है फिर सिमरन रूपी पंखा भी अपने आप चलता रहेगा ।

कबीर साहेब जी का कथन है

"सुमिरन की सुुधि यूं करो , जैसे गागर पनिहार"*

सुमिरन हमें ऐसे करना है जैसे कोई स्त्री पानी की गागर लिये सिर पर रखकर जाती हुई सहेलियों से बातचीत भी करती है, और चलती भी है, पर गागर का पानी गिरने नहीं देती ।

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1 comment:

  1. Kachi aphe points mentioned...Kabir jee poetry is great...thanks for sharing...regards Goyal

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