Sunday, 20 September 2020

112 - पक्के साधक कैसे बने ?

एक बार एक गुरूजी, अपने शिष्यों को भक्ति का उपदेश देते हुए समझा रहे थे कि  "बच्चों पक्के साधक बनो, कच्चे साधक ना बने रहो।

 कच्चे पक्के साधक की बात सुनकर एक नये शिष्य के मन में सवाल पैदा हुआ, और उसने पूछ ही लिया,  गुरूजी ये पक्के साधक कैसे बनते हैं ?

गुरूजी मुस्कुराये और बोले, बेटा एक कहानी सुनाता हूं।

  एक गाँव में एक हलवाई रहता था, हलवाई हर रोज़ कई तरह की मिठाइयाँ बनाता था, जो एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट होती थी।    आस पास के गाँवो में भी हलवाई की बड़ी धाक जमी हुई थी, अक्सर लोग हलवाई की मिठाईयों और पकवानों का आनंद लेने आते थे।

 एक दिन हलवाई की दुकान पर एक पति पत्नी आये उनके साथ उनका छोटा सा बच्चा भी था, जो बहुत ही चंचल था। उसके पिता ने हलवाई को हलवा बनाने का आदेश दिया!

 वह दोनों तो प्रतीक्षा करने लगे, लेकिन वह बच्चा बार-बार आकर हलवाई से पूछता–  हलवा बन गया क्या ?” हलवाई कहता – “अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी।”

वह थोड़ी देर प्रतीक्षा करता और फिर आकर हलवाई को आकर पूछता– “खुशबू तो अच्छी आ रही है, हलवा बन गया क्या?”  हलवाई कहता– “अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी।”

एक बार, दो बार, तीन बार, बार-बार उसके ऐसा पूछने से हलवाई थोड़ा चिढ़ गया।

 इस बार बच्चे के पूछते ही, हलवाई ने एक प्लेट उठाई और उसमें कच्चा हलवा रखा और बोला–  “ले बच्चे खा ले,” बच्चे ने खाया तो बोला–  “ये हलवा तो अच्छा नहीं है।”

 हलवाई फौरन बोला- “अगर अच्छा हलवा खाना है तो चुपचाप जाकर वहाँ बैठ जाओ और प्रतीक्षा करो।”  इस बार बच्चा चुपचाप जाकर बैठ गया I

जब हलवा पककर तैयार हो गया तो हलवाई ने थाली में सजा दिया और उनकी टेबल पर परोस दिया ।

इस बार जब उस बच्चे ने हलवा खाया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा

उसने हलवाई से पूछा–  “हलवाई काका ! अभी थोड़ी देर पहले जब मैंने इसे खाया था, तब तो यह बहुत ख़राब लगा था, अब इतना स्वादिष्ट कैसे बन गया?”

 तब हलवाई ने उसे मुस्कुराकर, प्रेम से समझाते हुए कहा–  “बच्चे जब तू ज़िद कर रहा था, तब यह हलवा कच्चा था और अब यह पक गया है, कच्चा हलवा खाने में अच्छा नहीं लगता यदि फिर भी उसे खाया जाये तो पेट ख़राब हो सकता है लेकिन, पकने के बाद वह स्वादिष्ट और पोष्टिक हो जाता है।”

 अब गुरूजी अपने शिष्य से बोले-  “बेटा कच्चे और पक्के साधक का फर्क समझ में आया कि नहीं?”

शिष्य हाथ जोड़ कर बोला गुरू जी “हलवे के कच्चे और पक्के होने की बात तो समझ आ गई, लेकिन एक साधक के साथ यह कैसे होता है?”

गुरूजी बोले– "बेटा साधक भी हलवाई की तरह ही है, जिस तरह हलवाई हलवे को, आग की तपिश से धीरे धीरे पकाता है, उसी तरह साधक को भी स्वयं को निरन्तर साधना से पकाना पड़ता है।"

 जिस तरह हलवे में सभी आवश्यक चीज़ें डालने के बाद भी, जब तक हलवा कच्चा है, तो उसका स्वाद अच्छा नहीं लगता, उसी तरह एक सेवक भी चाहे कितना ही ज्ञान जुटा ले, कर्मकाण्ड कर ले जब तक भगवान का ध्यान, सुमिरन और भजन की अग्नि में नहीं तपता, तब तक वह कच्चा ही रहता है।

   जिस तरह हलवे को अच्छे से पकाने के लिए लगातार उसका ध्यान रखना पड़ता है, उसी तरह साधक को भी अपने मन की चौकीदारी करते रहना पड़ता है।

जब पकते-पकते हलवा का रँग बदल जाये उसमें से खुशबु आने लगे और उसे खाने में आनन्द का अनुभव हो, तब उसे पका हुआ कहते है।

उसी तरह जब साधना, साधक और साध्य तीनों एक हो जाये, साधक के शरीर से प्रेम की खुशबू आने लगे तब समझना चाहिए कि साधक पक्का हो चुका है।”

जब तक सेवक का सुमिरन पक्का न हो जाये, उसे "सावधान" और "सतर्क" रहना चाहिए!

क्योंकि माया बड़ी  ठगनी है, कभी भी साधक को अपने रास्ते से गिरा सकती है. अतः साधक को नित्य-निरंतर सुमिरन और भजन से खुद को मजबूत बनाना चाहिए!



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