Saturday, 8 August 2020

107 - क्या सुख-दुख हमारे कर्मो का फल है ?

हम कौन होते हैं मालिक के काम में दखल अंदाज़ी करने वाले जो कुछ हो रहा है, उस मालिक की मर्ज़ी से ही तो हो रहा है. इसलिये कभी जीवन में दुःख भी आ जायें तो चिन्ता नहीं करनी चाहिये क्योंकि उसकी गत वो ही जाने,

न जाने कौन से कर्म कटवाने होंगे, कौनसा लेनदेन चुकता करना होगा, हमें क्या खबर ? इसलिये मालिक की रज़ा में राज़ी रहने में ही समझदारी है।

मालिक के भाणे में रहना सीखें हम लोग और बाकी सब कुछ उस परमपिता परमात्मा पर छोड़ दें, विश्वास रखें बस अपने विश्वास को डगमगाने बिल्कुल ना दें। फिर देखें कि कैसे हमें मालिक इन दुःखों को सहन करने की शक्ति हमें बख्शते हैं।

सहनशक्ति तो क्या मालिक इन दुःखों को कैसे पहाड़ से राई में तब्दील कर देते हैं , हमें पता तक नहीं चलता।
बस जरूरत है अटूट विश्वास और सच्ची सेवा की जिसकी ओर तो हम लोगों का बहुत कम ध्यान जाता है।

इसलिये हम लोग ये प्रण करें कि उठते-बैठते, सोते-जागते, चलते-फिरते, खाते-पीते, काम-काज करते, कभी-कभी, कहीं-भी अपनी असली कमाई यानी भजन सिमरन की ओर ध्यान दें ना कि बाकी की फालतू और बेमतलब की चीज़ों की ओर फिर देखें कि सच्चा सुख क्या होता है।

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